प्रकृति और पतन के बढ़ते कदम : अंकुर मिश्र "युगल"

Wednesday, July 10, 20130 comments

मानते है प्रगति पथ पर हम बहुत आगे बढे हो,

बदलो से और ऊपर चाँद-तारो पर चढ़े हो !

जलधि अम्बर एक करके स्वर्ग धरती पर बनाए ,

और मरुस्थल पर भी तुमने मृदु अम्बु के अंचल बहाए !

ब्रह्म का नितशोध करके ब्रह्म ज्ञानी तुम कहाए ,

मौत के मुख से भी जिंदगी तुम वापस ले आए !

चाहते क्या कोकिला भी गीत अब गए नही ,

क्या मधुर पुष्पों के उपवन है तुम्हे भाए नही !

नाज से मुक्ति की ऐसी एक दुनिया बनाओ ,

शान्ति हो सदभाव हो विध्वंश के सभ नाश हो!!

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